नई दिल्ली, 4 सितंबर (वि.प्र.)
एसआईआर कानूनी लेकिन प्रकिया निष्पक्ष नहीं है. यह प्रतिपादन पूर्व चुनाव आयु्नत अशाेक लवासा ने दिल्ली के एक कार्यक्रम में सरकार काे घेरते हुए कहा. उन्हाेंने कहा- सरकारें ऐसा व्यवहार कर रहीं जैसे ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’, 13 कराेड़ लाेगाें का नाम हटाना बेहद चिंताजनक है. पूर्व चुनाव आयुक्त अशाेक लवासा ने गत दिवस कहा कि मतदाता सूचियाें का चल रहा विशेष गहन संशाेधन (एसआईआर) वैधानिक निकायाें और संस्थानाें द्वारा अपनाई जा रही जिसके पास बल है वही सही है की विचारधारा का एक उदाहरण है.
एसाेसिएशन फाॅर डेमाेक्रेटिक रिफाॅर्म्स (एडीआर) द्वारा आयाेजित प्राेफेसर जगदीप सिंह छाेकर मेमाेरियल में लेक्चर देते हुए लवासा ने कहा कि आज के सबसे चिंताजनक रुझानाें में से एक यह है कि वैधानिक संस्थाएं, संवैधानिक निकाय और सरकारें अचानक इस तरह व्यवहार करने लगी हैं जैसे कि जिसकी लाठी उसकी भैंस, एक ऐसी अवधारणा जिसे उन्हाेंने अप्रचलित बताया.
एसआईआर काे लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है.
अब पूर्व चुनाव आयुक्त अशाेक लवासा ने इसपर सवाल उठाए हैं. उन्हाेंने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर काे लाखाें नागरिकाें पर थाेपी जा रही एक अनुचित प्रक्रिया बताया है.
अशाेक लवासा ने कहा, हालांकि न्यायपालिका ने इस कवायद काे वैध ठहराया है और सरकार ने इसे कानूनी करार दिया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये न्यायसंगत है. पूर्व चुनाव आयुक्त ने मतदाता सूची से 13 कराेड़ नाम हटाने के औचित्य पर सवाल उठाए. उन्हाेंने पूछा कि क्या यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त काेशिशें की जा रही हैं कि इस प्रक्रिया से मतदाता अलग-थलग न पड़ें. मतदाता सूची के पुनरीक्षण काे लेकर बढ़ती चिंता का जिक्र करते हुए उन्हाेंने कहा कि 33 प्रतिशत लाेग मतदान नहीं करते और इतने बड़े पैमाने पर किए जा रहे बदलाव लाेगाें काे लाेकतांत्रिक प्रक्रिया से और दूर कर सकते हैं.
चुनाव आयाेग के अधिकारियाें ने किया था ये दावा : अशाेक लवासा ने आगे कहा, जब निर्वाचन आयाेग बिहार में एसआईआर की तैयारी कर रहा था, तब उसके अधिकारियाें ने दावा किया था कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियाें काे बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार के कई नागरिक मिले थे. हालांकि निर्वाचन आयाेग ने ऐसे लाेगाें की संख्या या उनके बारे में काेई प्रमाण साझा नहीं किया जाे मतदाता सूची में शामिल हाेने के याेग्य नहीं थे.