श्रीकृष्ण का जीवन कर्मयोग व प्रेरणा का संदेश देता है

श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनिजी म.सा. ने कहा

    06-Sep-2026
Total Views |
 
BFS
कोथरुड, 5 सितंबर (आ.प्र.)
श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनि जी म.सा. ने कहा कि, श्रीकृष्ण के जीवन का वर्णन करते हुए गुरुदेव ने कहा कि श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन सदैव प्रेरणास्पद रहा है. श्रीराम को जहां मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है, वहीं श्रीकृष्ण को 16 कलाओं से संपन्न माना गया है. जैन दर्शन के अनुसार श्रीकृष्ण तीन खंड के अधिपति थे. उनका जन्म अत्यंत विषम परिस्थितियों में कारागार में हुआ. उनके जीवन का प्रारंभ और अंतिम समय भी नितांत एकांत में हुआ, लेकिन उन्होंने अपने जीवन को इस प्रकार जिया कि वे सर्वप्रिय और लोकनायक बन गए. श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व चुंबक की तरह लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता था. बचपन से ही उनके जीवन की घटनाएं लोगों के लिए आकर्षण और प्रेरणा का केंद्र रही हैं. उन्होंने संसार में रहते हुए कर्मयोगी के रूप में जीवन जीया. यही कारण है कि वे युगों-युगों तक स्मरण किए जाने वाले महापुरुष बने. वैदिक परंपरा के साथ-साथ जैन दर्शन में भी श्रीकृष्ण का जीवन आदर और प्रेरणा का विषय रहा है. शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, जीवन जीने की कला सिखाता है शिक्षक दिवस के अवसर पर गुरुदेव ने शिक्षा और गुरु की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पुराणों में शिक्षा के विभिन्न स्तरों का सुंदर वर्णन मिलता है. जो व्यक्ति सामान्य जानकारी प्रदान करता है, उसे अध्यापक कहा जाता है. जो उस ज्ञान में और अधिक विस्तार एवं गहराई जोड़ता है, वह उपाध्याय कहलाता है. जो उस ज्ञान को जीवन में उतारने की कला सिखाता है, वह आचार्य है. जो विशेष एवं गहन जानकारी प्रदान करता है, वह पंडित कहलाता है. लेकिन जो व्यक्ति बुद्धि को इतना विकसित कर दे कि मनुष्य को आत्मा, धर्म और जीवन के वास्तविक उद्देश्य से जोड़ दे, वही गुरु कहलाता है. गुरुदेव ने कहा शिक्षक का कार्य केवल पुस्तकीय ज्ञान देना नहीं है, बल्कि विद्यार्थी के व्यक्तित्व का निर्माण करना और उसे सही दिशा प्रदान करना भी है. उन्होंने राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने गीता सहित विभिन्न धर्मों एवं दर्शन पर अपने गहन विचार प्रस्तुत किए. शिक्षा हमारे जीवन-निर्माण का महत्वपूर्ण पड़ाव है. वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की चर्चा करते हुए गुरुदेव ने कहा आज परिस्थितियां काफी बदल गई हैं. वर्तमान व्यवस्था में बच्चों को शिक्षित तो किया जा सकता है, लेकिन उन्हें अनुशासन सिखाने के लिए डांट- फटकार करने पर रोक बढ़ गई हैं. ऐसे में शिक्षक के सामने ज्ञान देने के साथ-साथ संस्कार, अनुशासन और जीवन-मूल्यों का निर्माण करने की चुनौती भी है.