कोथरुड, 6 सितंबर (आ. प्र.) मनुष्य के जीवन में उसकी दृष्टि, सोच और भावनाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. व्यक्ति संसार को जैसा देखता है, उसे वैसा ही संसार दिखाई देता है, इसलिए कहा गया हैजैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि. दृष्टिकोण सकारात्मक हो तो विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति अच्छाई खोज लेता है, जबकि नकारात्मक दृष्टि होने पर अनुकूल परिस्थितियों में भी कमियां और दोष ही दिखाई देते ह्ैं. जैन दर्शन में जीवन की इसी दृष्टि को सम्यक दृष्टि और मिथ्या दृष्टि के माध्यम से समझाया गया है. मिथ्या दृष्टि वाला जीव बाहरी परिस्थितियों और दूसरों के दोषों को देखने में अधिक रुचि रखता है. वह अपनी परेशानियों के लिए परिस्थितियों और दूसरे व्यक्तियों को जिम्मेदार ठहराता रहता है. इसके विपरीत सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति आत्मनिरीक्षण करता है और प्रत्येक परिस्थिति से कुछ न कुछ सीखने का प्रयास करता है.जब तक जीव की दृष्टि मिथ्या रहती है, तब तक उसकी सोच में राग-द्वेष, पूर्वाग्रह और दोष-दर्शन का प्रभाव बना रहता है. व्यक्ति दूसरों की कमियों को सहजता से देख लेता है, लेकिन अपनी कमियों को स्वीकार करने में कठिनाई अनुभव करता है. सम्यक दृष्टि प्राप्त होने पर ही दृष्टिकोण बदल जाता है. व्यक्ति दूसरों में दोष खोजने के बजाय स्वयं के भावों और कर्मों का निरीक्षण करने लगता है. विपरीत परिस्थितियां भी उसके लिए आत्मविकास और कर्मनिर्जरा का माध्यम बन सकती ह्ैं. सभी को सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता और प्रशंसा- आलोचना का सामना करना पड़ता है. यदि हम प्रत्येक घटना में केवल नकारात्मकता तलाशेंगे तो मन अशांत रहेगा, लेकिन यदि विवेकपूर्ण दृष्टि से देखा जाए तो कठिन परिस्थितियां भी जीवन के लिए शिक्षक बन सकती ह्ैं. दूसरों में कमियां निकालना बहुत आसान है, लेकिन अपनी दृष्टि को निर्मल बनाना साधना है.