पिंपरी, 7 सितंबर (आ.प्र.) किसी व्यक्ति का सम्मान उसकी जन्म- जाति के आधार पर तय नहीं होना चाहिए. शूद्र व्यक्तियों को भी वेद पढ़ने और समझने का अधिकार मिलना चाहिए, इसी उद्देश्य से महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फुले और पिछड़े वर्ग के नागरिकों के कहने पर वर्ष 1875 में पुणे के मोमिनपुरा में महर्षि दयानंद सरस्वती ने व्याख्यान दिया था. वेदपाल आर्य ने बताया कि कुल 35 व्याख्यानों के माध्यम से उन्होंने मानव कल्याण का मार्ग दिखाया. महर्षि दयानंद सरस्वती पुणे प्रवास प्रवचन के 151वें स्मृति समारोह के अवसर पर महाराष्ट्र आर्य प्रतिनिधि सभा, पिंपरी, पुणे, नाना पेठ, वारजे, खड़की, आलंदी और चिंचवड़ आर्य समाज के संयुक्त तत्वावधान में रविवार (6 सितंबर) को पिंपरी आर्य समाज भवन में आयोजित कार्यक्रम में वेदपाल बोल रहे थे. इस अवसर पर कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं पिंपरी आर्य समाज के प्रधान सुरेंद्र करमचंदानी, सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली के महामंत्री एडवोकेट प्रकाश आर्य, आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली के महामंत्री विनय आर्य, राजस्थान के वैदिक विद्वान आचार्य कर्मवीर मेधार्थी, नर्मदापुरम मध्य प्रदेश से ऋतुस्पति आर्य, प्रमोद तिवारी, प्रमोद मिश्रा, बालकृष्ण भिड़े के वंशज छाया बर्वे भिड़े, एडवोकेट गंगाराम भाऊ म्हस्के के वंशज राजेंद्र म्हस्के, समन्वयक प्रो. साईनाथ पुण्णे आदि उपस्थित थे.