कोथरुड, 7 सितंबर (आ.प्र.) श्री वर्धमान सांस्कृतिक प्रतिष्ठान में विराजित गुरुदेव श्री अभिषेक मुनि जी म. सा. ने कहा कि धर्म की महिमा हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है. धर्म के साथ त्याग और प्रत्याख्यान का समावेश हो जाए तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है. महापुरुषों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने का प्रयास करने से जीवन में सुख और शांति की अभिवृद्धि होती है. गुरुदेव ने कहा संसार में कोई भी जीव दुख नहीं चाहता. प्रत्येक व्यक्ति सुख और शांति की कामना करता है, लेकिन इच्छा सुख की होती है और जीवन में दुख अधिक दिखाई देता है. इसका मूल कारण आत्मा के साथ अनादिकाल से चला आ रहा कर्मों का संबंध है. राग, द्वेष और कषाय आत्मा को कर्मबंधन में बांधे रखते हैं. आत्मा का परिचय देते हुए उसके विभिन्न भेद बताए हैं, जिनमें कषाय आत्मा भी एक अवस्था है. कषाय आत्मा से गहराई से जुड़ी हुई है. इससे मुक्ति का प्रमुख साधन सम्यक दर्शन है. जब जीव को सम्यक दर्शन की प्राप्ति हो जाती है, तब विपरीत परिस्थितियों और कष्टों के बीच भी वह अपने आत्मस्वरूप से निर्लेप रहने का प्रयास करता है. छोटी-सी सुई खो जाए तो उसे ढूंढना कठिन होता है, लेकिन यदि उसमें धागा लगा हो तो उसे आसानी से खोजा जा सकता है. उसी प्रकार सम्यक दर्शन रूपी धागा जिस आत्मा से जुड़ जाता है, वह संसार में भटकने पर भी शीघ्र ही सन्मार्ग की ओर लौट आती है. सम्यक दर्शन के अभाव में जो परिस्थितियां निर्जरा का साधन बन सकती हैं, वही कर्मबंधन का कारण बन जाती हैं. मिथ्या दृष्टि के कारण व्यक्ति अच्छे वातावरण में रहकर भी कमियां खोजता रहता है. मिथ्यात्व की यह अवस्था आत्मा के साथ लंबे समय से जुड़ी होने के कारण सहजता से समाप्त नहीं होती. इसके लिए निरंतर पुरुषार्थ और साधना आवश्यक है.