काेराेना ने सिखाया जीवन क्षणभंगुर व प्रकृति सर्व श्नितमान है : डाॅ. राेहित अग्रवाल

    19-Jul-2021
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 दंत विशेषज्ञ के अनूठे विचार; बचपन से दांताें की सफाई के महत्व काे समझने की सलाह भी दी
 

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मुँह की बीमारियाँ, सीधे शरीर के अन्य अवयवाें से संबंधित बीमारियाें काे आमंत्रण दे सकती हैं.अतः माता-पिता काे, अपने बच्चाें काे, छाेटी उम्र से ही दाँताें एवं मुँह की स्वच्छता से संबंधित व्यवस्थित जानकारी देनी चाहिए. उन्हें केवल दाँताें ही नहीं बल्कि मसूड़ाें एवं जीभ की नियमित स्वच्छता के बारे में भी बचपन से ही सिखाना चाहिए. दंत विशेषज्ञ डाॅ. राेहित अग्रवाल ने हमारे प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए अपने विचार व्यक्त किए.
 
आपके अनुसार, काेराेना काल में समाज में आए बदलावाें में से काैन से अस्थायी हैं और काैन से स्थायी?
 
डाॅ. अग्रवाल- काेराेना महामारी के कारण केवल समाज ही नहीं बल्कि मेडिकल क्षेत्र में भी कई बदलाव हुए हैं.काेराेना के कारण लाेगाें की मानसिकता में बहुत बड़ा और उल्लेखनीय बदलाव यह हुआ है कि अब लाेगाें काे समझ आ गया है कि जीवन कितना क्षणभंगुर है और प्रकृति सर्वशक्तिमान है. यह बदलाव स्थायी ताैर पर रहेगा. इस आपदा के दाैरान मेडिकल क्षेत्र काे कई नई बातें सीखने मिलीं, जिसके दूरगामी लाभ समाज काे मिलते रहेंगे.
 
पिछले एक दशक में आपके कार्यक्षेत्र में क्या सुधार हुआ है? इससे मरीज किस तरह लाभान्वित हाे रहे हैं?
 
डाॅ.अग्रवाल- किसी भी बीमारी का जल्दी निदान हाेना जरूरी हाेता है. अब डेंटल क्षेत्र में भी दाँताें एवं मसूढ़ाें की समस्याओं का अचूक एवं जल्दी निदान करने वाली मशीनें विकसित हाे गई हैं. सलाइवरी बायाे मार्कर, क्रेविक्युलर फ्लुइड बायाेमार्कर जैसे अत्याधुनिक उपकरण, सड़न एवं संक्रमण का विधिवत पता लगाकर दाँताें एवं मसूढ़ाें के उपचार में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. लेजर एवं माइक्राेस्काेपिक सर्जरी ’ विकसित हाेने के कारण मुँह के उन स्थानाें का भी बढ़िया एवं दर्द रहित उपचार संभव है, जहाँ तक आसानी से पहुँचा नहीं जा सकता. दाँताें व मसूढ़ाें की सर्जरी में थ्रीडी सीबीसीटी स्कैन एवं थ्रीडी रिकंस्ट्रक्शन जैसी सुविधाओं का उपयाेग मार्गदर्शक साबित हाे रहा है.
 
मसूढ़ाें की विभिन्न समस्याओं में से भारत में मुख्यतः काैन सी समस्या ज्यादा देखी जाती है?
 
डाॅ.अग्रवाल- हमारे देश में सामान्यतः मसूढ़ाें से संबंधित ’जिंजिवाइटिस’ नामक बीमारी सबसे ज्यादा हाेती है, जिसमें मसूढ़ाें से खून आता है. इसके अतिरिक्त पायरिया (मसूढ़ाें के पीछे की हड्डी कमजाेर हाेना) एवं मुख से दुर्गंध आने की बीमारी (दाँताे एवं मसूढ़ाें में गंदगी एवं चिकनाई जमने के कारण आने वाली दुर्गंध) भी भारत में बहुत सामान्य है.
 
पायरिया क्याें हाेता है ? सामान्यतः किस आयु में यह समस्या उत्पन्न हाेती है?
 
डाॅ. अग्रवाल- पायरिया यानी पेरिओडाँटिटिस के लिए मुख्यतः जेनेटिकल एवं लाेकल दाे कारक जिम्मेदार हाेते हैं. पायरिया गंभीर हाेने के पीछे भी यही दाे कारक जिम्मेदार है. लाेकल कारणाें में मुख्यतः मुँह के अस्वच्छ्ता, नियमित ब्रश न करना या गलत तरीके से ब्रश करना आदि कारण जिम्मेदार हैं. मसूढ़ाें से खून निकलना, पायरिया का प्रारंभिक लक्षण हाे सकता है. अतः मसूढ़ाें से थाेड़ा सा भी खून निकलने पर तत्काल डाॅक्टर से संपर्क करें क्याेंकि जिंजिवाइटिस की बीमारी बढ़ने पर, अंततः उसकी परिणति, मसूढ़ाें की हड्डियाँ कमजाेर हाेने एवं नष्ट हाेने( पायरिया) के रूप में ही हाेती है. पायरिया सामान्यतः 40 से 65 वर्ष की आयु में हाेता है. हालांकि जेनेटिक बदलावाें के कारण अथवा महिलाओं में हार्माेंस के बदलावाें के कारण , महिलाओं में 20 वर्ष की आयु के बाद भी पायरिया हाेने के उदाहरण माैजूद हैं.
 
मसूढ़ाें की कष्टदायक समस्या से बचने के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए ?
 
डाॅ. अग्रवाल- मसूढ़ाें की समस्याएँ विविध कारणाें से उत्पन्न हाेती हैं. सबसे बढ़िया उपाय है- जीवन शैली एवं आहार- विहार में सुधार करना. केवल दाँताें की नहीं बल्कि पूरे मुँह की स्वच्छता का महत्व जानना बहुत जरूरी है. इसलिए माता-पिता काे, अपने बच्चाें काे, छाेटी उम्र से ही दाँताें एवं मुँह की स्वच्छता से संबंधित व्यवस्थित जानकारी देनी चाहिए. उन्हें केवल दाँताें ही नहीं बल्कि मसूड़ाें एवं जीभ की नियमित स्वच्छता के बारे में भी बचपन से ही सिखाना चाहिए. दाँताें में सही ढंग से नियमित ब्रश करने, टंग क्लीनर की सहायता से जीभ साफ करने, मुँह में पानी भरकर जाेर-जाेर से कुल्ला करने, गरारे करने जैसे उपायाें से मुँह का स्वास्थ्य उत्तम रखा जा सकता है. फिर भी काेई दाँताें से संबंधित काेई भी समस्या उत्पन्न हाेने पर, लापरवाही न बरतते हुए समय पर उपचार करना चाहिए. साथ ही वह समस्या दाेबारा न हाे, इसके लिए नियमित परीक्षण कराते रहना आवश्यक है.
 
मेडिकल शाखा में प्रवेश लेने वाले नए छात्राें के लिए आपका क्या सुझाव है?
 
डाॅ. अग्रवाल- मेडिकल क्षेत्र में प्रैक्टिस शुरू करने के बाद सबसे ज्यादा काेई डाॅक्टर किसी बात से प्रभावित हाेता है, ताे वह है- तुलना करना. जरूरी नहीं कि यह तुलना बाहरी लाेग ही करें , कई बार हम खुद ही,’ फलाँ डाॅक्टर की प्रैक्टिस कितनी चलती है’,’उसके बारे में लाेग क्या बाेलते हैं’ जैसी बाताें में दूसरे डाॅक्टर से अपनी तुलना करने लगते हैं. इससे बचना चाहिए.
साथ ही, अपने मित्राें और सहयाेगियाें द्वारा, साेशल मीडिया पर की गई उनकी ’पाेस्ट’ और उनकी संख्या के आधार पर, उनकी सफलता का अनुमान बिल्कुल न लगाएँ. अपनी क्षमता एवं आसपास की परिस्थितियाें काे समझना एवं स्वीकारना सीखें; तभी आप अपनी पढ़ाई और करियर में सफल हाे सकेंगे.