पुणे, 4 सितंबर (आ.प्र.)
कोरोना महामारी के पूरे दो वर्षों बाद शनिवार को ‘पुणे फेस्टिवल` के अंतर्गत बालगंधर्व रंगमंदिर में आयोजित ‘हिंदी हास्य कवि सम्मेलन` में हंसी तथा तालियों गड़गड़ाहट से हॉल गूंज उठा. शाब्दिक और विनोदी रचना प्रस्तुत करते हुए कवि सम्मेलन में शामिल हुए कवियों ने रसिक-श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया. 34 वें पुणे फेस्टिवल केअंतर्गत हिंदी हास्य कवि सम्मेलन बालगंधर्व रंगमंदिर में शनिवार को आयोजित किया गया. जिसमें सुभाष काबरा,आशकरण अटल, डॉ. मुकेश गौतम, महेश दुबे, राजेंद्र मालवीय, सुमिता केशवा इन कवियों द्वारा रोजमर्रा के किस्से, उस पर आधारित रचना, पति-पत्नी के संबंधों पर आधारित विनोद और प्रस्तुत की गई रचनाओं को रसिकों ने तालियां और सीटियां बजाकर भरपूर रिस्पांस दिया.
महाराष्ट्र प्रदेश महिला कांग्रेस की उपाध्यक्षा एवं पुणे मनपा शिक्षा मंडल की पूर्व अध्यक्ष संगीता तिवारी, खड़की कैंटोन्मेंट बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष मनीष आनंद और महाराष्ट्रियन उत्तर भारतीय एकता मंच की सदस्य मुबेम संस्था द्वारा हिंदी हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया. कोरोना को लेकर सभी ने उल्लेख करते हुए रचना भी प्रस्तुत की. मुकेश गौतम ने अपनी रचना के माध्यम से कहा- गुजर रही थी जिंदगी ऐसे मुकाम से अपने ही दूर भागते थे जरा से जुकाम से क्या बताए दर्द-ए-दिल, किस हाल में हम जी रहे थे गिलास था रेड लेबल का और हम हल्दी पी रहे थे... इस रचना को रसिकों ने जोरदार तालियां बजाकर रिस्पांस दिया. सुमिता केशवा ने कहा कि, जिंदगी तुझसे समझौता कितना किया जाये शौक इतना भी नहीं कि मर-मर के जिया जाये... इसके साथ ही सुमिता केशवा ने अपनी दूसरी रचना प्रस्तुत की- जो हंसा उसका घर बसा/ मगर जिसका घर बसा उसको पूछो कब हंसा.. इस प्रस्तुति पर रसिकों ने भरपूर रिस्पांस दिया.
शादी तो ऐसी जंग है, सुनो मेरे साथी चोट लगने से पहले सभी हल्दी लगाते हैं... शादी को लेकर प्रस्तुत की गई इस रचना को भी रसिक श्रोताओं ने काफी रिस्पांस दिया. मनुष्य निष्कारण कैसे चिंता करता है या समस्या आने पर वास्तव में समस्या क्या है, यही उसे समझ नहीं आता. इस विषय को लेकर महेश दुबे ने अपनी रचना प्रस्तुत की. राजेंद्र मालवीय ने प्रस्तुत की हुई पंक्तियां जीवन की आपाधापी में/ खुशियों के कुछ पल मिलते हैं उनको खुशी में जी लेना/ यह मत कहो कल मिलते हैं इस रचना को रसिकों ने तालियां बजाकर रिस्पांस दिया.
शादी पश्चात पत्नी से बेजार होने के बाद ‘फीमेल` शब्द से ही नफरत होने लगती है. अगर बोलते हुए स्त्रीवाचक शब्द भी आ जाए तो उसके उच्चार वे पुरुषार्थी कैसे करते हैं और उसमें से निर्माण होने वाले विनोद को मालवीय द्वारा प्रस्तुत किये जाने पर श्रोताओं ने काफी सराहा गया. आशकरण अटल ने जीवन की अनेक घटनाओं पर आधारित विनोदी रचना और उस पर विचार करने को प्रवृत्त करने वाली रचना भी प्रस्तुत की.
सुभाष काबरा ने अपनी विनोदपूर्ण शैली में कवि सम्मेलन का शानदार संचालन किया. प्रमुख अतिथि के रूप में हॉकी स्टार पद्मश्री धनराज पिल्ले, दै. ‘आज का आनंद` के संपादक आनंद अग्रवाल और न्याती बिल्डर्स के नितिन न्याती उपस्थित थे. पुणे फेस्टिवल के मुख्य संयोजक डॉ. सतीश देसाई, एडवोकेट अभय छाजेड़, नगरसेवक रफीक भाई शेख, काका धर्मावत, संतोष उणेचा, मोहन टिल्लू, श्रीकांत कांबले के हाथों प्रमुख अतिथि और कवियों को सम्मानित किया गया. कार्यक्रम का प्रास्ताविक पुणे शहर महिला कांग्रेस की अध्यक्षा पूजा आनंद ने किया. कार्यक्रम का संचालन तथा आभार संगीता तिवारी ने व्यक्त किया.