निगड़ी, 28 अगस्त (आज का आनंद न्यूज नेटवर्क)
आहार- निद्रा- भय और मैथुन की दृष्टि से मनुष्य और पशु में कोई भेद नहीं है, परंतु सद्आचरण के कारण मनुष्य, पशु से भिन्न माना जाता है. वह मनुष्य भी पशु के समान है, जिसके जीवन में सुसंस्कारों की सुगंध नहीं है. अपनी संतान के जीवन को सुसंस्कारित करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मां- बाप की है. जब से संतान मां के गर्भ में आती है, तब से ही मां के आचरण के अनुसार गर्भ के शुभ- अशुभ संस्कारों का सिंचन शुरू हो जाता है. वर्तमान में होने वाले संस्कारों के ह्रास (नाश) को बचाने हेतु मां- बाप को अपना जीवन संस्कारमय बनाना जरूरी है.
जीवन की उन्नति के लिए दुर्गुणों को देखने में अंधा, दुर्वचनों को बोलने में मूक और निंदा सुनने में बहरा बनना चाहिए. परधन को पत्थर समान, पर स्त्री को माता के समान एवं समस्त जीवों को स्व- समान मानने से हमारा जीवन उज्ज्वल बनता है. अनगढ़ पत्थर किसी का सिर भी फोड़ सकता है तो शिल्पी के हाथ में रहा पत्थर जगत् पूज्य प्रभु- प्रतिमा का रूप भी धारण कर सकता है. जिसका जीवन संस्कारित हैं, वह मानव के चोले में भी देव कहलाता है और जिसका जीवन संस्कारित नहीं है, उसका जीवन पशु से भी बदतर बन जाता है, और जिसके आचरण को देख पशु भी शर्मिंदा हो जाते हैं.
विशेष : प्रतिदिन सुबह 9 बजे खानदेश मराठा भवन में संतश्री के प्रवचन होंगे.