दूषित नल के पानी का खामियाजा गरीबाें काे ही क्यों?

17 Jan 2026 13:17:16
 

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इंदाैर का नाम गंदे नल के पानी से हाेने वाली माैताें की वजह से सुर्खियाें में कैसे आ गया, जाे कि सरकारी सर्वे के अनुसार, 2017 से 2024 तक भारत का सबसे स्वच्छ शहर रहा? यह प्रश्न न केवल इंदाैर, बल्कि पूरे शहरी भारत और सभी राज्याें के लिए जरुरी है. यह शहरी शासन के विराेधाभास काे दिखाता है, जाे एक तरफ देखने में स्वच्छ और आकर्षक लग सकता है, ताे दूसरी तरफ पुरानी भूमिगत पाइपलाइन और नलाें से गंदे पानी की आपूर्ति कर सकता है. यह ज्यादा लाेगाें तक पानी पहुंचाने और पानी की सुरक्षा काे बराबर महत्व देने के जाेखिमाें काे भी उजागर करता है. सरकारें यह सुनिश्चित किए बिना कि पानी-पीने के लिए सुरक्षित है या नहीं नल से जलापूर्ति का लक्ष्य पूरा करती है.इंदाैर के निम्न आय वर्ग वाले इलाके भागीरथपुरा में बीते 25 से 30 दिसंबर के बीच नगर निगम की पाइपलाइन से आने वाले पानी काे पीने वाले कई लाेगाें की माैत हाे गई.
 
दूषित पानी से हुई माैताें की संख्या काे लेकर अब भी भ्रम बना हुआ है. जिला प्रशासन ने 18 पीड़िताें के परिवाराें काे मुआवजे के चेक बांटे हैं, जबकि अधिकाधिक आंकड़ा सात ही बताया जा रहा है. आंकड़ाें में इस विराेधाभास के बीच, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री माेहन यादव ने कहा है कि उनकी सरकार आंकड़ाें में नहीं उलझेगी, बल्कि सभी पीड़िताें के साथ खड़ी रहेगी.जन स्वास्थ्य अभियान (जेएसए) द्वारा नाै जनवरी काे प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी काे लिखे एक पक्ष में बताया गया है और 10 आईसीयू में है. जन स्वास्थ्य अभियान के कार्यकर्ता अमूल्य निधि का कहना है कि इंदाैर में नल के दूषित पानी से हाेने वाली माैतें ज्ञात समस्या थी. दिलचस्प बात यह है कि इंदाैर काे शहरी आधारभूत संरचना और पर्यावरणीय सुधार के लिए एशियाई विकास बैंक (एडीबी) से 1,365 कराेड़ रुपये का ऋण मिला है. यही नहीं, इस शहर काे अमृत (अटल मिशन फाॅर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफाॅर्मेशन)स्कीम और स्मार्ट सिटी परियाेजना का हिस्सा हाेने का भी फायदा मिला है.
 
जीएसए के स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने बताया कि प्रधानमंत्री काे लिखे पत्र में कहा गया है कि एडीबी से 2004 में लिए गए ऋण का मकसद हर नागरिक काे पर्याप्त पीने याेग्य साफ पानी देना था और शहर में साताें दिन चाैबीसाें घंटे पानी की आपूर्ति का वादा किया गया था. लेकिन परियाेजना के सफलतापूर्वक पूरा हाेने के एक दशक से ज्यादा समय बाद भी नागरिकाें काे पर्याप्त सुरक्षित एवं स्वच्छ पानी नहीं मिल रहा है. भागीरथपुरा के निवासियाें ने आराेप लगाया कि जब एडीबी से मिले ऋण के बाद पीने के पानी की नई पाइपलाइन बिछाई गई, ताे कुछ जगहाें पर उन्हें सीवर लाइनाें के साथ ही लगा दिया गया.हाे सकता है कि अब मासूम लाेग इस लापरवाही की कीमत अपनी जान देकर चुका रहे हाें.जनवरी 2026 की शुरुआत में, गुजरात की राजधानी गांधीनगर भी टाइफाइड के प्रकाेप की चपेट में आ गई,जिसका कारण नगर निगम द्वारा आपूर्ति किया गया दूषित पानी ही था, और दिल्ली-एनसीआर के ग्रेटर नाेएडा में भी कुछ निवासियाें ने नल के पानी से बदबू आन की शिकायत की है.
 
शहरी भारत में दूषित नल के पानी के बारे में हाल की ये सभी खबरें नागरिक आधारभूत संरचना,विनियामक निगरानी और जनस्वास्थ्य के गहरे संकट काे दिखाती हैं. ये सभी खबरें बताती हैं कि कैसे तेजी से शहरीकरण,खराब याेजना और सुरक्षा मानकाें की अनदेखी ने मिलकर उन शहराें में ऐसी दुखद घटनाएं पैदा की हैं,जाे कभी अपनी स्वच्छता और विकास के लिए जाने जाते थे.
वर्ष 2019 में नियामक, एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की एक रिपाेर्ट (जाे 2013-2018 तक की थी) में इंदाैर और भाेपाल में पानी की आपूर्ति में बड़ी समस्याओं की चर्चा की कई थी. इसमें बताया गया था कि कुल 8.95 लाख निवासियाें (भाेपाल में 3.62 लाख और इंदाैर में 5.33 लाख) काे दूषित पानी की आपूर्ति की गई थी. जनस्वास्थ्य अभियान कार्यक़र्ता अमूल्य निधि ने पानी की सख्त जांच की तत्काल जरुरत पर भी प्र्रकाश डाला है.
 
अगर हम भागीरथपुरा जैसी त्रासदियाें काे राेकना चाहते हैं, वाे चर्चा सिर्फ इसी घटना तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.जेएसए की मांगाें में इंदाैर एवं देश के दूसरे इलाकाें में भी पानी से हाेनेवाली बीमारी के मुफ्त इलाज, पुरानी पाइपलाइनाें काे वैज्ञानिक जीआईएस आधारित नेटवर्क मैपिंग से बदलना पारदर्शी ऑडिटिंग और रिसाव व नुकसान काे कम करना, ठाेस कचरा प्रबंधन और सीवेज इंफ्रास्ट्र्नचर काे मजबूत करना (सेप्टिक टैंक और पानी की आपूर्ति व स्वच्छता का स्वतंत्र मूल्यांकन)शामिल है. उनका कहना है कि आपूर्ति किए जानेवाले पानी की मात्रा और गुणवत्ता जलापूर्ति के नियमकाें के अनुसार हाेनी चाहिए. साफ पानी सिर्फ स्वास्थ्य कार्यक़र्ताओं की चिंता का विषय नहीं, बल्कि व्यवसाय का मामला भी है.
 
अमीर घराें में अ्नसर वाटर फिल्टर बाेतल बंद पानी या बाेरवेल हाेते हैं, जबकि गरीब लाेग लगभग पूरीतरह से नगर निमग की आपूर्ति पर ही निर्बर रहते हैं दूषित नल के पानी का खामियाजा सबसे गरीब और सबसे कमजाेर लाेगाें काे उठाना पड़ता है. असुरक्षित पानी की छिपी हुई लागत काम के छूटे हुए दिनाें, अस्पताल के खर्च, संस्थानाें पर कम हाेते भराेसे और कभी-कभी माैताें के रूप में सामने आती है. इंदाैर, गांधीनगर, और ग्रेटर नाेएडा शहरी आधुनिकता के आख्यान काे चुनाैती देते हैं. शहराें काे विकास के इंजन के ताैर पर पेश किया जाता है, पर उनकी जलापूर्ति व्यवस्था महामारियाें का इंजन बनती जा रही -पत्रलेखा चटर्जी वरिष्ठ पत्रकार
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