हिंदू मान्यताओं में धनतेरस के दिन घर के लिए कुछ खरीदना शुभ माना जाता है. साधन-संपन्न लाेग इस दिन सिर्फ बर्तन खरीदकर शगुन पूरा नहीं करते, बल्कि साेना या चांदी खरीदते हैं. दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के लिए भी चांदी के स्निके खरीदने का प्रचलन रहा है. यही वजह है, उस समय साेने -चांदी के दाम तेज हाे जाते हैं. जिन लाेगाें काे जल्दी नहीं हाेती,वे इंतजार करते हैं कि त्याैहार के बाद बाजार मंदा हाेगा, तब गहने या साेना-चांदी खरीदेंगे. इस बार बैठे ऐसा साेचने वाले लाेग हाथ मिलते रह गए, बल्कि अभी तक मल रहे हैं.धनतेरस के दिन दस ग्राम साेना, 1,32,400 रूपये का था, वहीं एक किलाे चांदी 1,70,000 रूपये की थी. बीते शुक्रवार काे दिल्ली के सर्राफा बाजार में दस ग्राम साेने का भाव 1,43,760 रूपये था. धनतेरस से करीब 11,000 रूपये ऊपर. इस बीच चांदी एक नया पहाड़ चढ़ चुकी है.
दुनिया के बाजाराें में नरमी के बावजूद एक किलाे चांदी 2,95,000 रूपये की हाे चुकी थी. धनतेरस से करीब 60 प्रतिशत ऊपर सवाल है, आगे ्नया हाेगा? साेने-चांदी में तेजी का यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा या उस पर ब्रेक लगेगा? इन सवालाें पर विद्धानाें में मतभेद है. मतभेद से ज्यादा अनिश्चिता की स्थिति दिखती है. दरअसल, काेराेना के बाद से, खासकर पिछले एक साल में दाेनाें कीमती धातुओं ने जिस तरह की छलांग लगाई है. उसकी कल्पना या भविष्यवाणी किसी ने नहीं की थी. शायद इसीलिए आज भी काेई साफ राय सामने नहीं आ रही है. यह आर्थिक विशेषज्ञाें या उन लाेगाें के बीच साेच-विचार का विषय है, जाे चांदी-साेने काे निवेश या सट्टेबाजी की नजर से देखते हैं, लेकिन जरा उन लाेगाें की साेचिए, जिनके घराें की राैनक ही साेने-चांदी से हाेती रही है. शादी-ब्याह जैसा जश्न हाे या फिर तीज-त्याैतहार,घर की महिलाओं की सजावट में इन दाेनाें की अहम भूमिका है.
पूरे भारत में साेने-चांदी का इस्तेमाल अधिकतर आभूषणाें या पारिवारिक संपत्ति के रूप में ही हाेता रहा है. हां, यह बात भी साथ में जुड़ी रही है किअगर काेई मुसीबत आ पड़ी, ताे यही गहने या बर्तन बेचकर या गिरवी रखकर पैसे का इंतजाम किया जा सकता है. वैसे, इनकाे बेचना, आम ताैर पर अच्छा नहीं माना जाता. भारत की क्यों, अंग्रेजाें तक में ‘सेलिंग द फैमिली सिल्वर’काफी खराब अर्थाें में इस्तेमाल हाेता है, यानी नालायक औलाद पुरखाें की कमाई हुई संपत्ति बेचकर गुजारा करती है.
ऐसे में, साेने-चांदी की तेजी ने अनगिनत परिवाराें काे चिंता में डाल दिया है. जाे महिलाएं घर खर्च में से थाेड़ाथाेड़ा पैसे बचाकर पायल, बिछिया, बाली या अंगूठी जैसी चीजें जमा करती हैं, जिन घराें में शादी-ब्याह जैसे आयाेजन हाेने वाले हैं या जाे भविष्य में न जाने कब हाेने वाले किसी मांगलिक कार्य के लिए बचत करने में जुटे हैं कि वे उस व्नत गहने खरीदेंगे, इन सभी फिक्र का अंदाजा लगाना मुश्किल है.
एक मित्र हैं. शेयर बाजार और निवेश से जुड़े विषयाें का विश्लेषण करते हैं, राजनीति पर भी चर्चा करते हैं. कई साल पहले बाजार में घूमते व्नत उन्हें एक साेने की चेन पसंद आ गई. अस्सी ग्राम की चेन थी, 75,000 रूपये के आसपास की मिल गई. अब अंदाजा लगाइए कि आज उनके गले से कितनी बड़ी संपत्ति लिपटी हुई है? फर्ज कीजिए,किसी के पास तब इतने पैसे न हाें और उसने साेचा था कि कुछ साल बचत करके वह ऐसी चेन खरीदेगा. आज वह इसी चेन का काैन सा हिस्सा खरीद पाता? सवाल है. ऐसे ही चलता रहा, ताे ्नया आम भारतीय परिवार काे अपनी प्रथाएं और परंपराएं बदलनी पड़ेंगी? ्नया आम आदमी काे साेने-चांदी के गहनाें का ख्याल दिल से निकाल देना चाहिए. या इनके दाम कम हाेने की काेई उम्मीद बाकी है? जवाब बहुत दूर नहीं हैं. सन 1950 में दस ग्राम साेना 99 रूपये का था, बीच में 120 रूपये तक चढ़ने और 63 रूपये तक गिरने के बाद 1975 में यह 540 रूपये का हुआ और सन 2000 में4,400 रूपये का था.
वहां से यहां तक का सफर ताे आपके सामने है. बीच-बीच में दाम में गिरावट भी आती रही, पर पिछले 25 वर्षाें में साेना जबदस्त छलांग लगा चुका है. निवेशकाें की भाषा में कहें,ताे लंबी रेस का घाेड़ा है यह. महंगाई बढ़ने के साथ भी साेना बढ़ता है और देश की मुद्रा कमजाेर हाेने के साथ भी. चांदी भी उसके साथ ही चलती थी, मगर इधर निवेशकाें की नजर भी चांदी पर मेहरबान हाे गई है और उसका औद्याेगिक इस्तेमाल भी बहुत बढ़ गया है. इसी कारण चांदी साेने से ज्यादा तेजी से भाग रही है. ऐसे में, जाैहरी और सर्राफा व्यापारी भी चिंतित हैं कि ्नया करूं पिछले कई साल से वे हल्के गहने बनाने में जुटे हैं. वन ग्राम गाेल्ड ज्वेलरी इसी का एक रूप है. ताकि इंसान कम खर्च में भी अपने शाैक पूरे कर सके.
इसी तरह, बहुत से बड़े आभूषण निर्माता ईएम आई स्कीम भी चलाने लगे हैं, जिसमें ग्राहक पहले पैसा जमा करते हैं और आखिर में उन्हें आभूषण मिल जाते हैं.इस तरह के नुस्खाें के अलावा बुजुर्गाेर् की पुरानी सीख भी कारगर है. आधुनिक फाइनेंशियल प्लानर भी यही सलाह दे रहे हैं कि अपनी जरूरताें का हिसाब पहले लगाकर उस हिसाब से याेजना बनाएं. जब गहनाें की जरूरत पड़ने वाली हाे उसके काफी समय पहले से धीरे-धीर.े साेना खरीदकर जमा करते रहें. दाम बढ़ने का बजट पर, गहनाें के वजन पर और खरीदारी पर असर पड़ना ताे स्वाभाविक है. इससे निपटने के लिए खरीदार और बिकवाल तरह-तरह की काेशिशें भी करते रहेंगे,लेकिन तेज गिरावट की उम्मीद में बैठे रहना महंगा पड़ सकता है. -आलाेक जाेशी वरिष्ठ पत्रकार