काश! इस साल ताे युद्धाें से मु्नित मिल जाती

08 Jan 2026 23:06:33
 
 

thoughts 
 
हमारे प्रधानमंत्री ने दुनिया में युद्ध के खतराें काे राेकने के लिए कई काेशिशें की हैं. यह सराहनीय है, लेकिन निरस्त्रीकरण के लिए भारत कुछ कर भी रहा है? हम स्वयं जब परमाणु हथियाराें पर निर्भर हैं, तब दूसराें काे इस पर अंकुश लगाने काे कह सकते हैं क्या? हां, दुनिया हमारी परिस्थिति जानती है. हमारे पड़ाेसियाें के पास परमाणु हथियार हैं और हमारे बीच गहरी समस्याएं हैं. फिर भी, अपनी सुरक्षा तैयारी काे बनाए रखते हुए हम निरस्त्रीकरण के पक्ष में बहुत कुछ कह-कर सकते हैं.निरस्त्रीकरण के लिए राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए एक पुख्ता कार्य-याेजना बनाई थी. हालांकि, बात आगे बढ़ी नहीं. अगर आज भारत परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में कुछ कर दिखाए, ताे विश्व काे एक बड़ी मिसाल मिलेगी.क्याें न इस पर हम चीन के साथ बात करें और उसे एक द्विपक्षीय समझाैता के लिए कहें कि ‘नाे फर्स्ट यूज’, यानी पहले हमारी तरफ से हमला नहीं हाेगा.
 
हां, निरस्त्रीकरण में आज हमारी जनता की वह श्रद्धा नहीं है, जाे तब थी. हमारी सरहदी चुनाैतियाें ने हमें अस्त्र-शस्त्र का पक्षधर बना दिया है. हम विजय चाहते हैं. शांति काे बाद में देखा जाएगा. यह ठीक नहीं. देश की सुरक्षा की प्राथमिकता पर काेई बहस नहीं, पर वह भारत भारत नहीं, जाे विस्फाेटाें में सारंग सुने व विध्वंस में मृदंग. हम अपनी सुरक्षा और रक्षा काे कभी कमजाेर नहीं हाेने देंगे, पर हमारी मानसिकता में युद्ध से लगाव हमारा नाश कर देगा.साल 2025 के अंतिम दिनाें में बांग्लादेश में हुए खूनखराबे ने सांप्रदायिक रंग ले लिया. यह बेहद दुख और चिंता की बात है, क्याेंकि वह ‘बदला’ की भयानक परंपरा काे उजागर करती है. बदले की भावना एक अतृप्त आग है, जाे कभी थमती नहीं. अगर उसकाे माैका मिले, ताे हमें राख कर देगी.
 
जरूरी है कि बांग्लादेश के शासक उसकाे बढ़ने न दें और उतना ही जरूरी है कि हम भारत में उसकाे भड़कने न दें. संकल्प करें कि हमें गांधी, बादशाह खान, पटेल, नेहरू, आजाद, सुभाष, आंबेडकर, भगत सिंह की कसम, हम सांप्रदायिक दंगे भड़कने नहीं देंगे! बांग्लादेश में नाेबेल शांति पुरस्कार से अलंकृत माेहम्मद यूनुस पर यह जिम्मेदारी आई है कि उस मुल्क के अवाम में नफरत न फैले. अगर नफरत पर लगाम नही लगती है वहां, ताे उसका अंजाम भयानक हाेगा, न सिर्फ बांग्लादेश के लिए, बल्कि अन्य देशाें के लिए भी.हम हैं इस भूमि की उपज, लेकिन हम इस भूमि का उजाड़ भी हैं. हम, यानी मानव जाति. पृथ्वी तप रही है, सूरज की वजह से नहीं, बल्कि हमारे कारण, हमारे भाेगउपभाेग के कारण. औसत तापमान ऐसा चढ़ा है कि समुद्र फूल रहा है, जल-स्तर की वृद्धि से जलवायु पैटर्न बदल रहे हैं.
 
बाढ़, आंधी, चक्रवाती तूफान, माैसमाें काे उलट रहे हैं. तूफान कब आएंगे, कितने जाेर से, यह काेई नहीं कह सकता. चंद घंटाें में हजाराें कराेड़ का नुकसान हाे जाता है.यह सब मानव जाति की देन हैं. प्रदूषण से हमारी दिल्ली कराह रही है. मुझ जैसे बूढ़ाें काे, बच्चाें काे यह हवा डराती है. जान काे खतरा है. उद्याेगशालाएं ‘एफ्लुएंट्स’, यानी अपशिष्ट धाराएं बहाती आ रही हैं. कार्बन उत्सर्जन सीमा से कहीं अधिक लगातार जारी है. हम कहते हैं, विकसित दुनिया पहले इनकाे राेके, फिर हमें राेकने काे कहें. इस तर्क में दम है, लेकिन तर्क ज्यादा, तथ्य कम. उस तर्क के पीछे उद्याेग का स्वार्थ शरण ले रहा है.
 
काेई भी सरकार समाज के समर्थन के बिना कुछ नहीं कर सकती. क्या हम (मैं और आप) सरकार काे इस विषय पर अपना साथ दे रहे हैं- ईंधन, पानी, बिजली के खर्च काे कम करने में या कूड़े-कचरे के फैलाव काे कम करने में? मैंने काेई संयम नहीं दिखाया है, इसलिए मुझे किसी काे भी पर्यावरण की देखभाल या प्रदूषण निवारण पर उपदेश देने का अधिकार नहीं, पर नए साल में काेशिश करने का निर्णय कर सकता हूं कि मैं धरती काे उजाड़ने वालाें से अलग हाेकर, उसके संरक्षकाें की श्रेणी में शामिल हाेने की काेशिश करूंगा, ताकि पर्यावरण-विनाशी कार्रवाइयाें के खिलाफ आवाज उठाने का मुझे नैतिक अधिकार मिले. इन कार्रवाइयाें की सिर्फ दाे मिसालें दे रहा हूं्.
 
पहली, प्रगति के नाम पर हिमालय में सड़काें की चाैड़ाई, बांधाें की गहराई, टनल की खुदाई या नए भवनाें के निर्माण का काम पर्यावरण काे चाेट पहुंचाता है और इंसान की जान काे खतरे में डालता है. भू-वैज्ञानिकाें का कहना है कि यहां कभी भी बड़ा भूकंप आ सकता है. हिमालयी भूगर्भ में तनाव-खिंचाव बहुत बढ़ गया है. हमें इस भूकंप के खतरे से घबराना नहीं है, लेकिन सचेत जरूर हाेना है.इन हिमालयी हकीकत काे पहचानना है. दूसरी मिसाल, हिमालय से बहुत दूर, हमारे दक्षिण में, जहां निकाेबार द्वीप के अमूल्य और अनुपम पर्यावरण का विनाश हाेने काे है, उसी ‘प्रगति’ के नाम पर. यह मामूली बात नहीं है. इसकाे कहा जा सकता है, ‘मैन-मेड एनवायर्नमेंटल डिजास्टर’, यानी मानव-निर्मित पर्यावरणीय आपदा. ऐसे में, साल 2026 निर्णायक श्रेयकर बन सकता है. क्या वह वैसा हाेगा. -गाेपाल कृष्ण गांधी
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