नाबालिग को देह व्यापार में धकेलना मानवता के प्रति गंभीर अपराध

बाल यौन शोषण और देह व्यापार पर कानून विशेषज्ञ एड.बीएस धापटे ने व्यक्त की स्पष्ट राय

    15-Feb-2026
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नाबालिग लड़कियों को देह व्यापार में धकेलने के मामले केवल अपराध नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ गंभीर अन्याय हैं. भारतीय कानून ऐसे मामलों में पीड़िता को दोषी नहीं, बल्कि संरक्षण की पात्र मानता है. इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर कानूनी प्रावधानों, दंड और पुनर्वास की प्रक्रिया को समझने के लिए हमने एक विधि विशेषज्ञ से विशेष बातचीत की. प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के मुख्य अंश-एड. भालचंद्र धापटे, मोबाइल-9850166213
 प्रश्न- भारतीय कानून नाबालिग लड़कियों की देह व्यापार में कथित भागीदारी को किस दृष्टि से देखता है?
उत्तर- भारतीय कानून स्पष्ट रूप से मानता है कि 18 वर्ष से कम आयु की किसी भी लड़की की देह व्यापार में उपस्थिति स्वैच्छिक भागीदारी नहीं हो सकती. इसे सीधा-सीधा यौन शोषण माना जाता है. ऐसी स्थिति में लड़की को आरोपी नहीं, बल्कि पीड़िता (Victim) के रूप में देखा जाता है. POCSO Act के तहत 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे की किसी भी प्रकार की यौन गतिविधि अपराध है, और उसकी सहमति कानूनी रूप से अमान्य है. वहीं Immoral Traffi c (Prevention) Act (ITP ) के अंतर्गत वेश्यालय चलाना, नाबालिगों की भर्ती या परिवहन करना गंभीर दंडनीय अपराध है. कानून का उद्देश्य नाबालिग की गरिमा की रक्षा और उसका पुनर्वास सुनिश्चित करना है.
 प्रश्न 2: ऐसे अपराधों में शामिल लोगों पर किस प्रकार की सख्त कार्रवाई की जा सकती है?
उत्तर- इन मामलों में शामिल हर व्यक्तिदलाल, ग्राहक, संचालक या तस्करी में शामिल कोई भी व्यक्तिकानूनी कार्रवाई के दायरे में आता है. IPC धारा 370 के तहत मानव तस्करी पर 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है. धारा 372 और 373 नाबालिगों की खरीद-फरोख्त को अपराध घोषित करती हैं. POCSO Act के तहत कम से कम 10 वर्ष की सजा, जो परिस्थितियों में आजीवन कारावास तक बढ़ सकती है.इसके अलावा जुर्माना, संपत्ति की जब्ती और पीड़िता को मुआवजा देने का भी प्रावधान है. अदालतें ऐसे मामलों को अत्यंत गंभीरता से लेती हैं
प्रश्न 3: यदि कोई नाबालिग लड़की स्वयं को स्वेच्छा से शामिल बताती है, तो क्या उसे कानूनी मान्यता मिलती है?
उत्तर- नहीं, कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति वैध सहमति देने में सक्षम नहीं होता. इसलिए स्वेच्छा का तर्क अदालत में मान्य नहीं है. अक्सर गरीबी, धोखे, झूठे वादों या दबाव के कारण लड़कियां इस जाल में फंसती ह्‌ैं‍. ऐसे में कानून वयस्क अपराधियों को जिम्मेदार मानता है, न कि लड़की को.
प्रश्न 4: पुलिस कार्रवाई या छापे के बाद नाबालिग लड़कियों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है?
उत्तर- छापे के दौरान यदि नाबालिग पाई जाती है, तो उसके साथ संवेदनशील और मानवीय व्यवहार अनिवार्य है.Juvenile Justice Act के तहत उसे Child in Need of Care and Protection माना जाता है. उसे Child Welfare Committee (CWC) के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है. पहचान गोपनीय रखी जाती है.चिकित्सीय जांच, मानसिक परामर्श और सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था की जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि ऐसी पीड़िताओं के साथ अपराधी जैसा व्यवहार नहीं होना चाहिए
प्रश्न 5: इस समस्या पर दीर्घकालिक नियंत्रण के लिए किन उपायों की आवश्यकता है?
उत्तर-सिर्फ कठोर दंड पर्याप्त नहीं है. जागरूकता और रोकथाम भी उतनी ही आवश्यक हैं. स्कूलों में कानूनी साक्षरता और बाल अधिकारों पर शिक्षा, अभिभावकों की सतर्कता और संवाद, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए रोजगार और कौशल विकास योजनाएं,समाज द्वारा पीड़िताओं को समर्थन और पुनर्वास के अवसर यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय जिम्मेदारी का विषय है.