बेंगलुरु में श्री श्री रविशंकर की उपस्थिति में महाशिवरात्रि सम्पन्न

45वें वर्ष की ऐतिहासिक शिवरात्रि पर श्रद्धालुओं ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के प्राचीन अवशेषों के दर्शन किये

    17-Feb-2026
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बेंगलुरु, 16 फरवरी (वि.प्र.)

 कल्पना करें, एक ही आकाश के नीचे, एक ही चेतना में डूबे दस लाख से अधिक श्रद्धालु; चारों ओर गहन निस्तब्धता, और उस मौन के मध्य वेिशविख्यात आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरुदेव श्री श्री रविशंकर की दिव्य आभा में सम्पन्न होती एक अत्यंत प्रभावशाली ध्यानसाधना. पावन महाशिवरात्रि की इस रात्रि में यह दृश्य मानो अलौकिक अनुभूति का साक्षात रूप बन गया. आर्ट ऑफ लिविंग के अंतर्राष्ट्रीय केंद्र में आयोजित इस भव्य महोत्सव के समापन के साथ ही श्रद्धालु अपने साथ एक अविस्मरणीय, आत्मानुभूति से परिपूर्ण संध्या की स्मृतियाँ लेकर लौटे ; जहाँ आत्मा को स्पंदित कर देने वाला संगीत, गुरुदेव के सान्निध्य में रूपांतरकारी ध्यानसत्र तथा वैदिक अनुष्ठानों की मंगलध्वनियाँ वातावरण को पवित्रता, आनंद और उत्सवमयी चेतना से भर रही थीं. इस अवसर पर गुरुदेव ने कहा, महाशिवरात्रि वह अवसर है जब आत्मा भौतिक जगत से ऊपर उठकर किसी सूक्ष्म, दिव्य लोक का स्पर्श करती है. शिव प्रत्येक कण में विद्यमान हैं. हमारी चेतना का स्वभाव ही शिव है. शिव में निमग्न होना भक्ति है, और प्रत्येक में शिव को देखना सेवा है. जो अविनाशी है, वह हमारे भीतर ही है. यदि हमें इतना भी वेिशास हो जाए, तो जीवन में किसी अभाव का स्थान नहीं रहता. कहा जाता है कि जो प्रेम और श्रद्धा से शिवरात्रि का अनुष्ठान करता है, उसकी सभी कामनाएँ स्वयं ही पूर्ण हो जाती हैं. आश्रम में इस वर्ष का उत्सव विशेष रूप से ऐतिहासिक बन गया, क्योंकि श्रद्धालुओं को हाल ही में प्राप्त मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के प्राचीन अवशेषों के दुर्लभ दर्शन का सौभाग्य मिला. माना जाता है कि 1026 ईस्वी में महमूद गजनी के आक्रमण में यह ज्योतिर्लिंग ध्वस्त कर दिया गया था. रुद्रम के मंत्रोच्चार, वैदिक विधानों और भक्तिमय संगीत की स्वर-लहरियों के मध्य ब्राजील, अर्जेंटीना, वेनेजुएला, मलेशिया, थाईलैंड, बुल्गारिया, अरब देशों, चीन तथा यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य-पूर्व के अनेक राष्ट्रों से आए श्रद्धालु एक ही चेतना में बंधकर नृत्य, गान और ध्यान में लीन हो उठे. दिन भर में तीन लाख से अधिक श्रद्धालुओं को महाप्रसाद परोसा गया, जिसकी तैयारी के लिए 15 टन से अधिक सरिजयों का उपयोग हुआ और हजारों स्वयंसेवकों ने सेवा-भाव से योगदान दिया. आश्रम में इस पावन अवसर पर वैदिक रीति से अनेक विवाह संस्कार भी गुरुदेव की उपस्थिति में सम्पन्न हुए.