त्रिपुरा काे समझने के लिए केवल उसके भाैगाेलिक स्वरूप या विकास के आंकड़ाें काे देखना पर्याप्त नहीं है.धान के खेताें की फैली हरियाली, नहराें पर बिखरी धूप और गांव की छताें पर सुनाई देने वाली रवींद्र संगीत की मीठी स्वर-लहरियां मिलकर यहां की दिनचर्या तय करती हैं.कभी-कभी शाम की नम. ठंडी हवाओं में सचिन देव बर्मन के सुराें की झिलमिलाहट सुनाई देती है, जाे इस भूमि की सांस्कृतिक गहराई काे शब्दाें से परे पहुंचा देती है. मैंने अपनी हालिया यात्रा में जब यह दृश्य देखे, ताे महसूस हुआ कि त्रिपुरा कैसे परंपरा और आधुनिकता का सम्मिलित अभियान बन चुका है.यही अभियान त्रिपुरा की जमीनी हकीकत का एक प्रतिबिंब है. प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी ने उत्तर-पूर्व काे ‘अष्टलक्ष्मी’ के रूप में देखने जाे दृष्टिकाेण दिया, उसी के अनुरूप त्रिपुरा में ‘कने्निटविटी’ काे विकास की पहली शर्त बनाया गया.
सड़कें इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं. भाजपा सरकार के दाैरान राज्य का सड़क नेटवर्क 850 किलाेमीटर से बढ़कर 1,550 किलाेमीटर से अधिक हाे गया है. महाराजा बीर बिक्रम हवाई अड्डा अब एक आधुनिक प्रवेशद्वार बन चुका है. 30 लाख यात्रियाें की वार्षिक क्षमता वाला यह आधुनिक टर्मिनल न केवल राज्य काे देश और दुनिया से जाेड़ रहा है. बल्कि यहां आने वाले हर यात्री के साथ नई संभावनाएं भी ला रहा है. ब्राॅड-गेज-रेल नेटवर्क अब त्रिपुरा के सबसे दक्षिणी शहर सबरूम तक पहुंच गया है.प्रधानमंत्री माेदी के नेतृत्व में ‘हीरा’ (हाइवे, इंटरनेट, रेलवे और एयरवेज) माॅडल ने सुनिश्चित किया है कि निवेश, पर्यटन और अवसर अब त्रिपुरा तक सहजता से पहुंचे. इस सश्नत बुनियादी ढांचे के सहारे त्रिपुरा ने अपनी उन विशिष्ट श्नितयाें काे आगे बढ़ाया है. जाे इस भूमि की आत्मा से जुड़ी हैं, ताकि उसका स्थानीय सामर्थ्य राष्ट्रीय और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से प्रभावी रूप से जुड़ सके.
राज्य में माताबारी पर्यटन सर्किट की आधारशिला रखते हुए मैंने यह अनुभव किया.पूर्वाेत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय, पर्यटन मंत्रालय, त्रिपुरा सरकार और निजी संस्थाओं के साझा प्रयासाें से ‘हाेल ऑफ गवर्नमेंट’ दृष्टिकाेण के तहत 450 कराेड़ रूपये की इस परियाेजना काे आकार दिया जा रहा है, ताकि त्रिपुरा भारत के उभरते पर्यटन मानचित्र पर मजबूती से अपनी जगह बना सके. चार-पांच दिनाें का ‘एंड-टू एंड टूरिस्ट सर्किट’ ठाेस ढांचागत विकास और मानवीय सेवाओं, दाेनाें काे जाेड़ता है. सुगम रास्ते,ठहरने की सुव्यवस्थित जगहें, प्रशिक्षित स्थानीय गाईड और हर पड़ाव पर अनूठा ज्ञान मिलकर सैलानियाें काे एक समग्र कहानी सुनाते हैं.महाराजा बीर बिक्रम हवाई अड्डा से शुरू हाेकर सिपाहीजाला वन्य जीव अभ्यारण्य, टेपानिया, माता त्रिपुर सुंदरी मंदिर, नीरमहल, उनाकाेटी और डंबूर झील तक का यह मार्ग प्रकृति, आस्था और लाेक कला काे एक सूत्र में जाेड़ देता है.
उनाकाेटी इस अनुभव का केंद्र है. पहाड़ियाें पर उकेरी गई विशाल आकृतियां, भगवान शिव की 30 फीट ऊंची मुखाकृति, पत्थर पर तराशी गई जटाएं और रेखाएं, इस स्थल काे अद्वितीय बना देती हैं. यह धराेहर बताती है कि त्रिपुरा में विरासत काे सहेजते हुए विकास काे आगे बढ़ाया जा रहा है. इसे साेच के साथ माताबारी सर्किट की आधारशिला रखी गई, ताकि आस्था और आधुनिक सुविधाएं एक साथ आगे बढ़ें. त्रिपुरा की आर्थिक पहचान काे वैश्विक मंच तक ले जाने वाली सबसे सुंदर कहानी अगरवुड की है, जिस पर इस प्रदेश की राजधानी का नाम अगरतला पड़ा. यही अगरवुड अब नर्सरी से लेकर सुगंधित तेल की प्राेसेसिंग तक याेजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहा है. पूर्वाे त्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय द्वारा संचालित 80 कराेड़ रूपये की ‘अगरवुड वैल्यू चेन डेवलपमेंट परियाेजना’ की नींव रखी गई है. इस पहल के तहत असम के लाेगाे पाेलाघाट और त्रिपुरा के कदमतला मे दाे ‘्नलस्टर प्राेसेसिंग सेंटर’ स्थापित किए जाएंगे. जहां ‘वल्यूएडिशन’और ‘मार्केट लिंक’ के जरिये विश्वा बाजार काे सीधे त्रिपुरा लाया जा रहा है. यह ‘लाेकल टू ग्लाेबल ’का जीवंत उदाहरण है.
अपने दाैरान मुझे कदमतला की संगीता माेहंता जैसी महिला उद्यमी से मिलने का माैका मिला, जाे इस परिवर्तन की पहचान बनकर सामने आई. उनके लिए अगरवुड सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि आत्मनिभरता और सम्मानजनक जीवन का आधार है. उनके प्रयासाें से कई महिलाएं आजीविका से जुड़ रही हैं. पूर्वाे त्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय द्वारा हाल में उत्तर-पूर्वी राज्याें के लिए 80 कराेड़ रूपये की बांस परियाेजनाओं का शुभारंभ किया गया. जिसने ‘ग्रीन गाेल्ड,’यानी बांस काे वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी उद्याेग के रूप में स्थापित करने काे दिशा दी है. इसके साथ अमेजाॅन, फ्लिपकार्ट और एटीपी (ऑल टाइम प्लास्ट्निस)जैसी वैश्विक कंपनियाें के साथ किए गए समझाैते के माध्यम से यहां का बांस उद्याेग तेजी से राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय बाजाराें से जुड़ रहा है. इन अभियानाें के केंद्र में स्थानीय कारीगर, महिलाएं और युवा हैं, जिनकी सहभागिता से यह उद्याेग आजीविका, उद्यम और आत्मविश्वास का स्त्राेत बन रहा है. विकास की यही लय जंगल और खेत, दाेनाें में समान रूप से दिखाई देती है.
-ज्याेतिरादित्य एम सिंधिया