विदर्भ के यवतमाल जिले में एक चाैंकाने वाली घटना सामने आई है कि नए साल के पहले महीने में ही 22 किसानाें ने आत्महत्या कर ली. गाैरतलब है कि यह कड़वी सच्चाई सामने आई है, जाे महाराष्ट्र में किसानाें की दुर्दशा दिखाती है, जबकि केंद्र की नरेंद्र माेदी सरकार भारत काे वर्ल्ड लीडर और दुनिया की सबसे बड़ी इकाॅनमी बनाने का सपना देख रही है.वसंतराव नाइक एग्रीकल्चर सेल्फ-रिलायंस मिशन के पूर्व प्रेसिडेंट किशाेर तिवारी ने यह जानकारी दी है. उनके मुताबिक, जनवरी में यवतमाल जिले में 22 किसानाें ने आत्महत्या की है.इसमें झारी-जमनी, बाभुलगांव, डिग्रस तालुका के 3-3, घाटंजी, केलापुर, यवतमाल तालुका के 2-2 और आर्नी, महागांव, दारव्हा, उमरखेड़, नेर, कलंब और रालेगांव तालुका के एक-एक किसान शामिल हैं.पश्चिमी विदर्भ के 45 प्रतिशत इलाके में कपास की खेती हाेती है. उसके बाद 40 प्रतिशत एरिया में साेयाबीन की खेती हाेती है, जबकि बाकी एरिया में दालें और ज्वार की खेती हाेती है.
लेकिन इस साल भारी बारिश से खेती काे नुकसान हुआ है, इसलिए इन्कम की उम्मीद खत्म हाे गई है. इस वजह से, जाे फसलें कट चुकी हैं, उनसे खेती का खर्च निकालना मुश्किल हाे रहा है और थके-हारे किसान सुसाइड कर रहे हैं. तिवारी ने कहा है कि पश्चिमी विदर्भ के यवतमाल, अमरावती, अकाेला, वाशिम, बुलढाणा और पूर्वी विदर्भ के वर्धा जिलाें में किसानाें के सुसाइड करने की संख्या ज़्यादा है.किशाेर तिवारी ने कहा कि पिछले साल यवतमाल ज़िले में सबसे ज़्यादा 446 किसानाें ने सुसाइड किया था. उसके बाद अमरावती ज़िले में 396, अकाेला में 388, बुलढाणा में 343, वर्धा में 224 और वाशिम ज़िले में 212 किसानाें ने सुसाइड किया था.इनमें से युवा किसानाें और किराए पर खेती करने वाले किसानाें के नाम नहीं हैं, इसलिए सरकार ने काेई सुसाइड रिकाॅर्ड नहीं किया है.किराए पर खेती करने वाले खेतिहर मज़दूराें की संख्या भी हर गांव में 50 प्रतिशत है. उन्हें सरकारी फसल लाेन या सरकारी मुआवज़ा नहीं मिलता. चूंकि फसल खराब हाेने पर भी खेत का किराया देना ज़रूरी है, इसलिए उन किसानाें के सुसाइड बढ़े हैं जिनका काेई नाम नहीं है