यूनिवर्सिटी की ब्रांडिंग माैलिकता का सवाल क्यों जरूरी है?

    03-Mar-2026
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यकीन मानिए, मुझे हैरानी नहीं हुई जब मुझे पता चला कि गलगाेटिया यूनिवर्सिटी के एक प्राेफेसर ने हाल ही में देश काे राजधानी में हुई भारत एआई इंपे्नट समिट में विवाद खड़ा कर दिया है. जी हा, प्राेफेसर नेहा सिंह काे अपनी यूनिवर्सिटी की उपलब्धि दिखाने के लिए झूठा दावा करने में जरा भी झिझक महसूस नहीं हुई. हां, हम सबने देखा कि किस प्रकार उन्हाेंने सरकारी टेलीविजन चैनल डीडी न्यूज काे विवरण दिया और वह भी उस किस्म काे चतुराई के साथ जाे हम काॅर्पाेरेट कंपनियाें के जहीन सेल्समैन में देखते है कि ओरियन नाम का राेबाेटिक श्वान यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ ए्नसीलेंस में विकसित किया गया है. जबकि कडवा सब यह है कि इस राेबाेट काे चीनी राेबाेट्निस कंपनी यूनिट्री ने ईजाद किया है, और यह भारत में भी ऑनलाइन बेचा जाता है.
 
इसमें अचरज नहीं है. क्योंकि हमारी पीढ़ी ने यूनिवर्सिटी के जिस आदर्श काे संजाेया था. वह भरभरा कर टूट चुका है. हमने साेचा था कि किसी यूनिवर्सिटी की पहचान उसकी व्यावहारिक सहभागिता, अर्थपूर्ण अनुसंधान, आलाेचनात्मक विचार, नैतिक संवेदनशीलता और सबसे ऊपर शिक्षण की गरिमा से जानी जाएगी. एक यूनिवर्सिटी, जैसा कि हम मानते हैं वह गुणवत्ता में किसी व्यवहारिक प्रतिष्ठान शाॅपिंग माॅल या विज्ञापन एजेंसी से अलग जगह हाेती है. लेकिन फिर हम एक बिल्कुल अलग समय में जी रहे हैं. जैसे-जैसे बाजार चलित नव उदारवादी मशीनी तार्किकता शिक्षण क्षेत्र पर कब्जा कर लेती है. शिक्षा पूरी तरह से व्यापार बन जाती है. आलाेचनात्मक विमर्श बलि चढ़ जाता है, छात्र उपभाे्नता बनकर रह जाता है और अध्यापक सेवा प्रदाता की भूमिका निभाने लगता है.
 
काेई हैरानी नहीं कि एक यूनिवर्सिटी भी अपनी ब्रांड वैल्यू बेचने लगी है. जैसे काेई कंपनी डिटजेंट पाउडर बेचती हाे और बेचे जाने वाले अपने उत्पाद के फायदाें के बारे में हर तरह के झूठे या बढ़ा-बढ़ाकर दावे किये.असल में, राेबाेटिका डेटा साइंस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ये फैंसी उत्पाद है जिन्हें नवउदारवादी यूनिवर्सिटी रणनीतिक विज्ञापनाें और बढ़ा- चढ़ाकर किए गए दावाें के जरिए बेचना चाहती है. इसलिए अगर काेई यूनिवर्सिटी एआई के क्षेत्र में अपनी उपलब्धि के बारे में झूठे दावे करती हाे ताे आपकाे और मुझे हैरानी क्यों हाेनी चाहिये? एक प्रकार से प्राेफेसर नेंहा सिंह काे दाेष नहीं दिया जाये क्योंकि आखिरकार वे खुद एक ऐसी संस्कृति का उत्पाद हैं जाे यूनिवर्सिटी काे लाभ कमाने वाला एक धंधा, एक प्राेफेसर काे जन संपर्क एजेंट और छात्र अथवा अभिभावक काे एक संभावित ग्राहक की तरह लेता है.
 
भले ही गलगाेटिया यूनिवर्सिटी फिलहाल खबराें में है, लेकिन सच ताे यह हैं कि एक यूनिवर्सिटी काे बांड के ताैर पर बेचने का यह काम अब आम बात है और शिक्षा के इस किस्म के सरेआम व्यावसायीकरण काे रैकिंग की राजनीति और आगे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है.सड़क किनारे लगे बिलबाेर्ड या चमकदार पत्रिकाओं एवं अखबाराें में दिए भव्य विज्ञापन देखिए ताे आप आसानी से गाैर कर सकते हैं कि कैसे इन सभी संस्थानाें काे टाॅप रैकिंग यूनिवर्सिटी के ताैर पर पेश किया जा रहा है. और ऐसी रैकिंग एजेसियाें की काेई कमी नहीं है जिनकी सेवाएं ये यूनिवर्सिटियां निरंतर लेती रहती हैं और आमंत्रित करती हैं.
 
और इन यूनिवर्सिटी की यत्नपूर्वक गड़ी छबि अ्नसर इनकी उपलब्धियाें और सबसे बढ़क़र इनके प्राेड्नट (छात्राें) काे, गूगल, इंफाेसिस, विप्राे, अमेजाॅन वगैरह से मिलने वाले पैकेज के बारे में हर तरह के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावाें से भरी हाेती हैं.समझ नहीं आता कि हंसा जाये या राेया जाये, जब पाते हैं कि काेई यूनिवर्सिटी इस किस्म के शानदार विज्ञापन से खुद काे दुकान के ताैर पर बेच रही हाेती है. मसलन यूनिवर्सिटी ने वर्ल्ड ्नयूएस यूनिवर्सिटी रैकिंग्स एशिया 2026 में हासिल किया एक और मील का पत्थर...दक्षिणी एशिया में 116वें और पूरे एशिया में 454 वें पायदान पर रखा गया है. डिग्री लेने वाले 98 प्रतिशत विद्यार्थियाें ने टाॅप की कंपनियाें में नाैकरी गली 5.4 लाख रूप औसत सालाना पैकेज और उच्चतम वेतन 15 कराेड़ रूपये वार्षिक.
इस किस्म के माहाैल में, काेई प्राेफेसर सच की तलाश करने वाला नहीं हाे सकता उसे भी उस यूनिवर्सिटी की ब्रांड वैल्यू के बारे में झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने पड़ते हैं.
 
जिसने उसे नाैकरी पर रखा है. प्राेफेसर नेहा सिंह की मानसिक उलझन सभी जान सकती है. इसके अलावा जिंदा रहने के लिए इन तमाम शिक्षा दुकानाें काे लगातार सत्तारुढ़ सरकार काे संतुष्ट करना पड़ता है. यह मत भूलिए कि गलगाेटिया यूनिवर्सिटी काे जैसा कि खबरें बताती है.एआई प्रदर्शनी हाॅल में चार आईआईटी काे कुल मिलाकर मिले बूथ से भी बड़ा बूथ मिला था और विशेष ताैर पर जब हमें बताया जाता है कि भारत काे विश्वगुरू हाेने के नाते आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में पीछे नहीं रहना चाहिए. यह तकनीकी आदर्शवाद का नवीनतम ब्रांड है जिसे काॅर्पाेरेट अरबपति बेचने के लिए बेकरार हैं. ताे शायद गलगाेटिया यूनिवर्सिटी ने सत्तारूढ़ सरकार काे खुश करने के लिए सारी हदें पार कर दीं और, विडंबना यह कि सरकार काे शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा. वास्तव में यह देश में राजनीति और शिक्षा की हालत पर एक दु:खद टिप्पणी है.
- अविजित पाठक