राजस्थान में दाे बहनें. उत्तर प्रदेश में तीन. दिल्ली में एक युवा साॅफ्टवेयर पेशेवर. हर कहानी का अंत एक दर्दनाक आत्महत्या पर आकर थमता है. राज्य अलग है. हालात जुदा हैं, पर पुलिस रिकाॅर्ड और राष्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूराे (एनसीआरबी) के आंकड़ाें में एक ही जुमला बार-बार गूंजता है. पारिवारिक विवाद या समस्याएं. भारत में युवा महिलाओं की आत्महत्याओं पर हाल ही में छिड़ी बहस काे महज अलग-थलग घटनाएं कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. एनसीआरबी के आंकड़े गंभीर हैं और संवेदनशील चिंतन की मांग करते हैं.एनसीआरबी की ए्नसीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया (2022)रिपाेर्ट के अनुसार देश भर में 1,64,000 से अधिक आत्महत्या की घटनाएं दर्ज की गईं. इनमें से 28,000 से ज्यादा महिलाएं गृहिणी थीं-यह एक ऐसा वर्ग है.
जाे हर साल महिला आत्महत्याओं में सबसे बड़ी हिस्सेदारी करता है. रिपाेर्ट यह भी बताती है कि आत्महत्या करने वाली महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा 18 से 30 वर्ष की युवतियाें का है, जिनके आगे एक पूरी जिंदगी पड़ी हाेती है.इनमें से अधिकांश मामलाें में अधिकारिक कारण पारिवारिक समस्या बताया जाता है. इन दाे शब्दाें की आड़ में भारतीय समाज का वह स्याह चेहरा छिपा है. जाे शहरीग्रामीण अमीर-गरीब या शिक्षित-अशिक्षित के बीच काेई भेद नहीं करता. एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 18-29 वर्ष आयु वर्ग में आत्महत्या के मामले स्त्री-पुरूष दाेनाें में सर्वाधिक हैं. यह आयु वर्ग सबसे संवेदनशील और जाेखिमग्रस्त माना जा रहा है. महिलाओं के लिए उम्र का यह पड़ाव शादी के साथ ही सामाजिक बदलाव भी लाता है.
इस बदलाव में सिर्फ पहचान ही नहीं बदलती, बल्कि अ्नसर जगह, कार्यबल में प्रवेश या निष्कासन उच्च शिक्षा शादी की बातचीत और बच्चे का जन्म भी शामिल हाेता है.नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-5) बताते हैं कि कानूनी पाबंदियाें के बावजूद कई राज्याें में बाल विवाह या कम उम्र में शादी की प्रथा अब भी प्रचलित है और घरेलू हिंसा आज भी एक गंभीर वास्तविकता है. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञाें ने भी इसे अवसाद और आत्महत्या के प्रमुख कारकाें के रूप में पहचाना है. लाखाें महिलाएं ऐसे नरक में जी रही है.जिसे उन्हाेंने खुद नहीं बनाया है और कई काे माैत ही इससे निकलने का रास्ता नजर आता है.हाल ही में, उत्तर प्रदेश का एक मामला राष्ट्रीय बहस का विषय तब बना, जब विवाह से जुड़ी पाबंदियाें और सामाजिक दबाव के चलते तीन नाबालिग बहनाें ने आत्महत्या कर ली.
राजस्थान में भी दाे महिला शिक्षिकाओं ने अपनी शादी से कुछ घंटे पहले जहर खाकर जान दे दी. वहीं दिल्ली में एक युवा पेशेवर पर अपनी पत्नी की हत्या का आराेप लगा. जहां विवाद की वजह साेशल मीडिया पाेस्ट से शुरू हुई तकरार बताई गई. कानूनी ताैर पर यह सभी मामले अलगअलग हैं. पर सभी मामलाें में एक ही दर्दनाक पहलू बार-बार सामने आता है. स्वायत्तता और सहमति काे लेकर तनाव महिलाओं काे समाज द्वारा तय किए गए पैमाने के आधार पर आंका जाता है. उन पर बहुत ज्यादा दबाव हाेता है.
भारतीय कानून वैवाहिक क्रूरता काे अपराध मानता है.घरेलू हिंसा के खिलाफ और उससे महिलाओं के संरक्षण के लिए देश में कानून हैं, पर जमीनी स्तर पर इनका क्रियान्वयन असमान है और सामाजिक कलंक के डर से अ्नसर महिलाएं शिकायत नहीं करतीं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी रिश्ताें केआपसी टकराव और हिंसा काे वैश्विक स्तर पर आत्महत्या के जाेखिम का एक प्रमुख कारण माना है. भारत में जहां शादी अ्नसर सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि पारिवारिक गठबंधन हाेती है. वहां जाेखिम ताे बढ़ते ही हैं और बदनामी भी कई गुना बढ़ जाती है. समाजशास्त्री लंबे समय से मानते आए हैं कि लड़कियाें काे बचपन से ही सामंजस्य बिठाकर चलना सिखाया जाता है.विवाह काे एक अपरिहार्य सत्य माना जाता है.जिसमें उन्हें उनकी मांओं की तरह त्याग करना हाेगा.दुनिया बदल गई है पर महिलाओं से वही पुरानी अपेक्षाएं की जाती हैं. जब एनसीआरबी के आंकड़ाें में पारिवारिक समस्याएं लिखा जाता है, ताे इसके भीतर वैवाहिक विवाद, दहेज, उत्पीड़न,संतानहीनता का दबाव, पीढ़ियाें के बीच टकराव और घरेलू आर्थिक तनाव जैसे अनेक कारण शामिल हाेते हैं.
एनसीआरबी के 2022 के आंकड़ाें के अनुसार, आत्महत्याओं के मामलाें में पारिवारिक समस्याएं सबसे बड़ा कारण रहीं, जाे कुल मामलाें के 30 फीसदी से अधिक के लिए जिम्मेदार थीं. महिलाओं के संदर्भ में यह अनुपात और भी अधिक भयावह है. द लैंसेट पब्लिक हेल्थ (2018) के अनुसार वैश्विक आत्महत्या के मामलाें में भारत की हिस्सेदारी लगभग एक-चाैथाई है. युवा भारतीय महिलाओं में आत्महत्या की दर, उसी आयु वर्ग के वैश्विक औसत से कहीं अधिक है.
सार्वजनिक चर्चाओं में अ्नसर छात्र आत्महत्याओं या किसान आत्महत्याओं काे प्रमुखता दी जाती है, पर विवाहित युवतियाें, खासकर गृहिणियाें काे उतनी तवज्जाें नहीं मिल पाती है. कॅरियर और नाैकरी के दबाव पर खुलकर बात हाेती है. परंतु याैन शाेषण या जबरन विवाह पर सार्वजनिक चर्चा नहीं हाेती.यही कारण है कि यह माैन संकट भीतर ही भीतर फैलता रहता है हालांकि, धीरे-धीरे परिवर्तन के संकेत भी दिखाई दे रहे हैं.इसे परंपरा बनाम आधुनिकता का संघर्ष बताना आसान है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी और जटिल है. भारत में पारिवारिक संरचनाएं विविधतापूर्ण हैं.असली समस्या परंपरा नहीं है. बल्कि परंपरा के भीतर किसी विकल्प का न हाेना है. - अद्वैता काला