बाॅम्बे हाईकाेर्ट की औरंगाबाद पीठ ने दाेहराया है कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानाें में कार्यरत शिक्षकाें के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करना अनिवार्य नहीं है. अदालत ने शिक्षा अधिकारियाें की कार्यप्रणाली की कड़ी आलाेचना करते हुए कहा है पिछले न्यायिक निर्देशाें के बावजूद टीईटी पास न हाेने के आधार पर शिक्षकाें की नियुक्ति प्रस्तावाें काे बार-बार खारिज किया गया है जाे उचित रवैया नहीं है. अदालत ने चेतावनी दी कि भविष्य में अगर ऐसी गलतियां दाेहरायी गयीं ताे संबंधित अधिकारियाें के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जायेगी.महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक स्कूलाें में काम करने वाले शिक्षकाें काे बड़ी राहत देते हुए न्यायमूर्ति विभा कंकणवाड़ी और न्यायमूर्ति अजीत बी. कड़ेठाणकर की खंडपीठ ने तीन अलग-अलग रिट याचिकाओं काे आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया. अदालत ने ‘शिक्षण सेवक’ के रूप में नियुक्त शिक्षकाें के खिलाफ शिक्षा अधिकारी के पारित अस्वीकृति आदेशाें काे रद्द कर दिया.
ये याचिकाएं सैयद अबू जैद सैयद रफीक और एक अन्य याचिकाकर्ता, गायकवाड़ सायली व्यंकटेश और साईनाथ गणपत बनसाेडे ने दायर की थीं. इन तीनाें मामलाें में शिक्षा विभाग ने इस आधार पर नियुक्तियाें काे मंजूरी देने से इनकार कर दिया था कि शिक्षकाें ने शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है.हाईकाेर्ट में कार्यवाही के दाैरान अधिवक्ता सैयद ताैसीफ यासीन ने सैयद अबू जैद और एक अन्य याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व किया, जबकि अधिवक्ता शेख तारिक माेबिन एच ने गायकवाड़ सायली व्यंकटेश का और अधिवक्ता केपी राॅज ने साईनाथ गणपत बनसाेडे की ओर से पक्ष रखा. सुनवाई के दाैरान याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि संबंधित स्कूल अल्पसंख्यक संस्थान थे, इसलिए उन पर टीईटी की शर्त उसी तरह लागू नहीं की जा सकती जैसे गैर-अल्पसंख्यक स्कूलाें पर की जाती है.