नई दिल्ली, 14 जुलाई (वि.प्र.)
भारत की रक्षा खरीद के पैटर्न में एक बड़ा बदलाव देखने काे मिल रहा है. भारतीय सेना काे अब केवल सीमित या त्वरित जवाबी कार्रवाई के लिए नहीं, बल्कि एक लंबी और बहुस्तरीय (मल्टीलेवल) जंग के लिए तैयार किया जा रहा है. रक्षा मंत्रालय के अनुसार, डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने हालिया संघर्ष के बाद से 55 महत्वपूर्ण प्रस्तावाें काे मंजूरी दी है, जिनकी कुल अनुमानित कीमत 9.80 लाख कराेड़ रुपए से अधिक है.
यह भारी-भरकम राशि एक साथ खर्च न हाेकर, आगामी कई वर्षाें में अलग-अलग साैदाें, स्वदेशी निर्माण कार्यक्रमाें और आधुनिकीकरण याेजनाओं पर चरणबद्ध तरीके से लगाई जाएगी.
वहीं, रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ाें के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात रिकाॅर्ड 38,424 कराेड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गया है, जाे कि पिछले वर्ष की तुलना में पूरे 62% की शानदार बढ़ाेतरी काे दर्शाता है.विशेषज्ञाें के अनुसार, भारत द्वारा अपनी सैन्य तैयारियाें काे इस तरह धार देने के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं कि, वैश्विक पटल पर अब अचानक युद्ध छिड़ जाना एक सामान्य बात हाेती जा रही है. आधुनिक समय में एक बार संघर्ष शुरू हाेने के बाद उसे कूटनीतिक रूप से तुरंत राेकना आसान नहीं रह गया है. दुश्मन देशाें की काेशिश अब यह हाेती है कि सैन्य संघर्ष काे जितना हाे सके लंबा खींचा जाए, ताकि सामने वाले देश काे आर्थिक रूप से कमजाेर और पंगु बनाया जा सके.
यही वजह है कि नए रक्षा प्रस्तावाें का मुख्य लक्ष्य महीनाें तक हथियाराें की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखना, युद्ध के मैदान में मरम्मत (रिपेयरिंग) के काम में तेजी लाना और रसद (लाॅजिस्टिक्स) काे मजबूत करना है। यूक्रेन और पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में चल रहे लंबे संघर्षाें ने भारत की पारंपरिक सैन्य साेच काे पूरी तरह बदल दिया है। हालांकि, पनडुब्बियाें के निर्माण और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानाें के प्राेजेक्ट्स में हाे रही देरी अब भी भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनाैती बनी हुई है.